इतिहास

स्वतंत्रता पूर्व

          बिलासपुर का पूर्वकालिक शासकीय परिवार अपने आप को चन्द्रवंशी राजपूत के वंशज मानता है, जिन्होंने मध्य प्रदेश के बुन्देलखंड के चंदेरी नामक स्थान पर राज किया। यह स्थान अब गुना जिले का हिस्सा है। कहा जाता है कि चन्देरी साम्राज्य के 7वें शासक हरिहर चन्द्र को माता देवी ज्वालामुखी का स्वप्न आया। इसके बाद उसने अपना भाग्य एक मन्दिर में तलाशना शुरू किया। परिणामस्वरूप उसने अपने साम्राज्य को अपने छोटे पुत्र गोबिन्द को सौप दिया तथा अपने बाकि चार पुत्रों के साथ ज्वालामुखी की ओर प्रस्थान किया। इससे पहले वे ‘जिन्दबाड़ी’ नामक स्थान पर रूके और वहां पर एक किले का निर्माण किया। वे नादौन भी गए जो उस समय कांगड़ा की राजधनी थीं कांगड़ा के राजा ने तम्बू का खूंटा बांधने की एक प्रतियोगिता का आयोजन और विशेष गांठ बांधने वाले व्यक्ति को अपनी पुत्री देने का वादा किया। वास्तव में यह गांठ एक पेड़ की जड़ के समान थी। सबीर चन्द इस प्रतियोगिता में शामिल हुआ परन्तु वह अपने घोड़े से नियंत्रण खो बैठा और मारा गया। इसमें कांगड़ा के राजा की धोखेबाजी पाई गई। इसके बाद युद्ध हुआ और कांगड़ा की सेना हार गई। कांगड़ा -टिक्का’ और चन्देरी राजा हरिचन्द दोनों मारे गए। बचे हुए तीनों चन्देरी राजकुमार ज्वालामुखी मन्दिर लौट आए। अधिरेष्टि देवी प्रकट हुई और उन सबको राज्य देने का वादा किया। भविष्यवाणी सच साबित हुई। तीनों राजकुमारों में से एक को कुमाऊं के राजा ने गोद ले लिया, दूसरे राजकुमार गम्भीर चन्द ने चम्बा पर कब्जा कर लिया तथा सबसे बड़े वीर चन्द को ‘जिन्दबाड़ी’ मिली जो वीरचन्द ही ने पंजाब के रोपड़ में आनन्दपुर तहसील है। वीरचन्द ही ने नयनादेवी मन्दिर बनवाया। अपने लगभग 33 वर्ष के शासन में उसने कहलूर रियासत की सीमा बढ़ाई तथा लगभग 15 पड़ोसी राजकीय राज्यों को अपने अधीन किया। उसके सीमा विस्तार की नीति को सिरमौर के राजा ने रोका जिसके साथ उसने शान्ति संधि की। इसके अंतर्गत उसने अपने लिए कहलूर रियासत रखी। वीरचन्द के बाद बहुत उत्तराधिकारी हुए जिनमें अन्तिम काहण चन्द था जिसने हिंडूर राज्य नालागढ़ को जीता और उसे अपने दूसरे पुत्र सुरजीत चन्द को दे दिया, जिससे कि वर्तमान नालागढ़ का शासकीय परिवार चला है।

शासकीय वंश की राजधानी सन् 1600 तक कोटकहलूर बनी रही। इसके बाद वीरचन्द अपनी माता के साथ सुन्हाणी भाग गया तथा वहीं बस गया। उसके पिता ज्ञान चन्द जो उस समय राजा थे, ने सरहिन्द के पास मुगल शासक के कहने पर इस्लाम कबूल किया। धरमंतर के बाद व कोटकहलूर लौटा और अपने पिता को राजा घोषित किया। उसने सतलुज के दाईं ओर सुन्हाणी में ही राजधानी रखी। 1650 में जब दीपचन्द कहलूर का राजा बना तो उसने राजधनी स्थानांरित की क्योंकि उस जगह को वह नापसंद करता था यह कहा जाता है कि दो हिन्दु और दो मुस्लिमों के साथ उसने राजधनी के लिए नई जगह तलाशी और अंत में सतलुज नदी के बाईं और व्यास गुफा को चुना जो व्यास ऋषी की तपोस्थली थी।

          उसने एक महल ‘धोलर’ नदी के ऊपर बनाया और नदी तट पर एक शहर बसाया जिसका नामकरण व्यासगुफा के नाम से किया। इसे बाद में बिलासपुर के नाम से जाना गया। तब से लेकर बिलासपुर की राजधनी बिलासपुर ही रही यद्यपि वास्तव में जिसे चन्देरी राजवंश ने बसाया था वह गोबिन्द सागर में डूब गया। पुराने शहर के ऊपरी तरफ एक नया शहर बस गया है जोकि समुद्र तल से 673 मीटर ऊँचा है।

स्वतंत्रता उपरान्त

15 अप्रैल, 1948 को 30 पंजाब और शिमला पहाड़ी रियासतों के विलय से हिमाचल प्रदेश भारतीय संघ भाग-ग श्रेणी के राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। ये रियासतें थीं- भागत, भज्जी, बाघल, बेजा, बलसन, धड़ी, घुन्ड, जुब्बल, धामी खनेती, क्योंथल, माध्न, माँधन, मांगल, रतेश, रावड़ीगढ़, सांगरी, सिरमौर, सकेत, थरोच और ठियोग। उस समय तक राज्य के चार जिले चम्बा, मण्डी, महासू, सिरमौर थे तथा कुल क्षेत्रफल 2,716,850 हेक्टेयर था। राज्य को 12 अक्तूबर, 1948 को  संसद के एक्ट के अनुसार केन्द्र के अधीन लिया गया, जो तब तक मुख्य आयुक्त के नियंत्रण में एक अलग इकाई थी, जिसे कि  1 जुलाई, 1 9 54 को हिमाचल प्रदेश के साथ एकीकृत किया गया और 106,848 हेक्टेयर क्षेत्र के साथ एक और जिले को जोड़ा दिया गया ।

शुरू में इसकी दो तहसीलें घुमारवीं और बिलासपुर सदर थीं। जनवरी, 1980 में अलग उप तहसील नयनादेवी बनाई गई जिसका मुख्यालय स्वारघाट था। 1984 में एक और उपतहसील झण्डूता, घुमारवीं तहसील से बनाई गई। इसे पूर्ण तहसील का दर्जा 1998 में दिया गया। प्रशासनिक दृष्टि से जिला दो उपखण्डों,  तीन तहसीलों, 1 उपतहसील, 3 सामुदायिक विकास ब्लॉक, 136 पंचायतों, 2 नगरपालिका तथा 2 अधिसूचित क्षेत्र कमेटी में बंटा हैं 1891 और 1901 की जनगणना में बिलासपुर एक शहर था परन्तु 1911 में इसे अवर्गीकृत घोषित किया गया। 1931 में इसे फिर शहर का दर्जा मिला और तब से यह चल रहा है। नयनादेवी जोकि धार्मिक महत्व का स्थान था को 1953 में नगर का दर्जा मिला। एक लघु कमेटी इसकी देखभाल के लिए गठित की गई। 1961 में से नगरपालिका का दर्जा मिला। 1981 के बाद एक और स्थान शाहतलाई को अधिसूचित क्षेत्र कमेटी बनाया गया।