ऐतिहासिक रुचि के स्थल

 

कोट कहलूर का किला

कोट कहलूर

कोट कहलूर

कोट कहलूर किला गंगुआल हाइड्रोईलैक्ट्रिक स्टेशन से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ये श्री नयना देवी जी की पहाड़ी पर स्थित है। बिलासपुर के विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों में कोटकहलूर किले का प्रथम स्थान है। कोटकहलूर नाम से प्रसिद्ध यह किला राजा कहल चन्द के पूर्वज राजा बीर चन्द ने बनवाया था। अब नष्ट हो चुका है इस प्रान्त का शासन बिलासपुर में स्थानांतरित होने से पूर्व कहलूर के नाम से जाना जाता था। यहां के स्थानीय लोगों में यह राज्य अभी भी कहलूर के नाम से ही जाना जाता है।

यह किला वर्गाकार आकार का है और इसकी प्रत्येक दीवार 30 मीटर ऊंची एवं 30 मीटर लम्बी है। इन दीवारों की चौड़ाई लगभग 2 मीटर है। यह किला दो मंजिला है और प्रत्येक मंजिल की ऊंचाई लगभग 15 मीटर है। इस किले की दूसरी मंजिल पत्थर के अनेक ऊंचे स्तम्भों पर आधारित है। इस किले की दूसरी मंजिल में श्री नयना देवी माता जी का मन्दिर है जिसमें श्री नैना देवी जी की मूर्ति स्थापित है। यहां पर सात अन्य किले बछरेटू, बहादुरपुर, बसेह, फतेहपुर, सरयूं, स्वारघाट एवं त्यून में स्थित है। सुन्हाणी जो की सीर खड्ड के किनारे बसा एक छोटा-सा गांव है, कुछ समय के लिए इस प्रान्त का मुख्यालय समझा जाता था।

बछरेटू किला

बछरेटू

बछरेटू

बछरेटू एक सुन्दर और शान्त स्थल है जोकि कोट धर की पश्चिमी ढलान और शाहतलाई नामक स्थान से 03 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह किला समुद्रतल से 3000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। बिलासपुर जिले के बछरेटू नामक स्थान पर एक प्राचीन छोटा-सा किला है। यह किला कोट नामक पहाड़ी पर स्थित है। इस स्थल से गोबिन्द सागर झील एवं अन्य पहाड़ियों का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। यह किला राजा रत्न चन्द ने बनवाया था जिसने बिलासपुर पर सन् 1355 से 1406 तक शासन किया था। प्राचीन धरोहर के रूप में यह किला लगभग 600 वर्ष पुराना हैं यह किला आयताकार आकार का है। इसकी दो दीवारें लगभग 100 मीटर और दूसरी दो दीवारें लगभग 50 मीटर लम्बी हैं। इन दीवारों की चौड़ाई लगभग एक मीटर है। किले के अन्दर का भाग अनेक कमरानुमा भागों में विभक्त है जिनमें से 15 को अभी भी ढूंढा जा सकता है। इन कमरों की दीवारें लगभग 10 से 12 मीटर ऊंची हैं। यहां पर एक पानी का टैंक, स्नानागार व बाबड़ी है। इस किले में एक छोटा मन्दिर है जिसमें देवी अष्टभुजा की मूर्ति स्थापित है। इसके अतिरिक्त इस मन्दिर में अन्य मूर्तियां भी विद्यमान हैं। किले में एक पीपल का वृ़क्ष भी है।

त्यून किला

तिऊन का किला

तिऊन का किला

त्यून किले के अवशेष त्यून पहाड़ी जो सत्रह कि०मी० लम्बी है के शिखर पर विद्यमान है। यह किला बिलासपुर कस्बे से लगभग 45 कि०मी० की दूरी पर स्थित है। घुमारवीं कस्बे से यह किला लगभग 10 कि०मी० की दूरी पर है। राजा काहन चन्द द्वारा इस किले को 1142 विक्रमी में बनवाया गया था। इस किले का क्षेत्रफल लगभग 14 हेक्टेयर है। यह किला आयताकार है। इस किले की लम्बाई 400 मीटर व चौड़ाई 200 मीटर है। इस किले की दीवारों की ऊंचाई 2 से लेकर 10 मीटर के लगभग है। इस किले के मुख्य द्वार की ऊंचाई 3 मीटर व चौड़ाई साढ़े 5 मीटर है। इस किले के अंदर पानी के दो टैंक थे। इसके अतिरिक्त इस किले में दो अन्न भंडार थे जिनमें 3000 कि०ग्रा० अन्न रखा जा सकता था। ऐसा कहा जाता है कि इस किले में राजा खड़क चन्द के चाचा को कारावास की सजा दी गई थी।

औहर का ठाकुर द्वारा

‘औहर’ जिला बिलासपुर के मध्य में स्थित एक कस्बा है। यह बिलासपुर प्रान्त का एक महत्वपूर्ण कस्बा माना जाता था। इस कस्बे के महत्व को ध्यान में रखकर रानी नागरदेई ने इस प्रसिद्ध ठाकुरद्वारे का निर्माण करवाया था। उन्होंने एक पानी की

औहर का किला

औहर का किला

बावड़ी और एक सरायं का निर्माण भी करवाया था जिसमें की यात्री/राहगीर ठहर सकें। ठाकुरद्वारा में ‘शालीग्राम’ और ‘नरसिम्हा’ नाहरसिंह की मूर्तियां स्थापित की गई थीं। इस मन्दिर की दीवारों पर सुन्दर चित्रकारी की गई है। इस मन्दिर की मुरम्मत के लिए संस्कृति एवं भाषा विभाग द्वारा वित्तीय सहायता प्रदान की गई है।